काठमांडू कैंप: 48 परिवारों की बदहाल जिंदगी, पांच साल से पुनर्वास का इंतजार, अब प्रशासन ने कहा- आने वालों का स्वागत

पांच साल से पुनर्वास का इंतजार, काठमांडू कैंप के 48 परिवारों की बदहाल जिंदगी, अब प्रशासन ने कहा- आने वालों का स्वागत

📅 बचेली, 29 अगस्त 2026 ✍️ रिपोर्ट: ब्रम्हा सोनानी 🕒 अपडेट: 2 मिनट पहले
बचेली के काठमांडू कैंप में टीन-टप्पर की झोपड़ी, जिसके दरवाजे पर एक महिला बैठी है, आसपास पहाड़ी क्षेत्र और कोहरा
📷 काठमांडू कैंप, बचेली में टीन-टप्पर की झोपड़ी जहां 48 परिवार पांच साल से बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं। महिला अपने घर के दरवाजे पर बैठी हुई है। पहाड़ी क्षेत्र में बसी यह बस्ती बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर है।
काठमांडू कैंप के विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए बनाए गए आवास, जो 2021 में बनकर तैयार हुए लेकिन 2026 तक खाली पड़े हैं
📷 काठमांडू कैंप के 48 विस्थापित परिवारों के लिए 2018-19 में 2.5 एकड़ जमीन पर बनाए गए 50 आवास, जो 2021 में तैयार हो गए थे, लेकिन पांच साल बाद भी खाली पड़े हैं।

⚠️ पांच साल का इंतजार, फिर भी नहीं मिला पुनर्वास

बचेली के काठमांडू कैंप में 48 परिवार आज भी टीन-टप्पर के झोपड़ियों में बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं। 2011 में हुए विस्थापन के बाद 2021 में इन परिवारों के लिए पुनर्वास के मकान बनकर तैयार हो गए, लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी ये परिवार अपने नए घरों में नहीं बस पाए हैं। अब प्रशासन ने कहा है कि अगर परिवार नीचे आकर रहना चाहते हैं तो उनका स्वागत है।

🏚️ कैसी है काठमांडू कैंप की जिंदगी?

बचेली के वार्ड क्रमांक 18 स्थित काठमांडू कैंप पहाड़ी क्षेत्र में बसा है। यहां तक पहुंचने के लिए घुमावदार और खतरनाक पहाड़ी सड़क से होकर गुजरना पड़ता है। घने कोहरे के कारण कुछ दूरी तक रास्ता भी साफ नहीं दिखता।

यहां के मकान टीन-टप्पर से बने हैं। बस स्टॉप भी टीन-टप्पर का ही है। बस्ती के भीतर पक्की सड़क नहीं है। कच्चे, पथरीले और पहाड़ी रास्ते से होकर लोग अपने घरों तक पहुंचते हैं। बारिश के मौसम में यह रास्ता और भी मुश्किल हो जाता है।

💧 मूलभूत सुविधाओं का अभाव और पानी की समस्या

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां बारिश और ठंड का असर अधिक रहता है। फिर भी यहां अस्पताल, दुकान और रोजमर्रा की जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, छोटी से छोटी जरूरत के सामान के लिए भी उन्हें करीब 25 किलोमीटर दूर बचेली जाना पड़ता है। माचिस जैसी छोटी चीज के लिए भी उन्हें खतरनाक पहाड़ी रास्ते से होकर नीचे जाना पड़ता है।

पेयजल की समस्या भी गंभीर है। ग्रामीण नाले के किनारे लोहे के पाइप डालकर जमीन के नीचे से आने वाले पानी को अपने घरों तक पहुंचाते हैं। एनएमडीसी की पानी की पाइपलाइन होने के बावजूद बारिश में उसमें लाल रंग का पानी आता है, जो डैम से आने वाला पानी है।

🏘️ 50 मकान बनकर तैयार, परिवार आज भी पहाड़ पर

ग्रामीणों के मुताबिक 2011 में एनएमडीसी के ब्लास्टिंग के चलते इन परिवारों के विस्थापन का फैसला किया गया था। 2018-19 में करीब 349.23 लाख रुपये की लागत से 2.5 एकड़ जमीन पर 48 परिवारों के लिए 50 आवास बनाए गए। 2021 में ये आवास बनकर तैयार हो गए, लेकिन 2026 तक करीब पांच साल बीत जाने के बावजूद प्रभावित परिवारों को वहां शिफ्ट नहीं किया गया।

मौके पर देखा गया कि पुनर्वास के लिए बनाए गए आवास खाली पड़े हैं। आवास परिसर की बाहरी बाउंड्री वॉल का कुछ हिस्सा इस साल हुई बारिश में क्षतिग्रस्त होकर गिर गया है।

🗣️ अधिकारी बोले- 'ग्रामीण नीचे नहीं आना चाहते थे, अब आना चाहें तो स्वागत'

इस मामले में अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अब तक यह जानकारी थी कि काठमांडू कैंप के निवासी पहाड़ से नीचे बनाए गए क्वार्टरों में आकर रहने के इच्छुक नहीं हैं। हालांकि अब यदि ग्रामीण स्वयं नीचे आकर पुनर्वासित होना चाहते हैं, तो उनका स्वागत है।

अधिकारियों के मुताबिक आवासों में जो भी कमियां शेष हैं, उन्हें जल्द दूर करने की व्यवस्था की जाएगी।

⛰️ रिजर्व फॉरेस्ट, डैम और ट्रक पार्किंग की चुनौती

अधिकारियों के अनुसार जिस स्थान पर आवास बनाए गए हैं, वह क्षेत्र रिजर्व फॉरेस्ट की सीमा में आता है और डैम के नीचे स्थित है, जिससे तकनीकी और सुरक्षा संबंधी अड़चनें हैं। एनएमडीसी के मुंबई से आए वैज्ञानिकों ने डैम क्षेत्र को खतरनाक जोन बताया है।

ट्रक पार्किंग की जमीन भी चुनौती है। बैलाडीला ट्रक ओनर एसोसिएशन ने इस क्षेत्र के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है।

❓ सवाल- पांच साल से खाली मकानों में कब बसेंगे परिवार?

एक ओर 48 परिवार पहाड़ पर टीन-टप्पर के घरों में कठिन परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं, दूसरी ओर 50 मकान पांच साल से खाली पड़े हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों का समाधान कब होगा और ये परिवार आखिर कब इन आवासों में बस पाएंगे?

© 2026 समग्र विश्व | सभी अधिकार सुरक्षित | रिपोर्ट: ब्रम्हा सोनानी

basant dahiya

मेरा नाम बसंत दहिया है। मैं लगभग 20 वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा हूं। इसी बीच मैंने बस्तर जिला व राजधानी रायपुर के प्रमुख समाचार पत्रों में अपनी सेवा देकर लोकहित एवं देशहित में कार्य किया है। वर्तमान की आवश्यकता के दृष्टिगत मैंने अपना स्वयं का न्यूज पोर्टल- समग्रविश्व अप्रेल 2024 से शुरू किया है जो जनहित एवं समाज कल्याण में सक्रिय है। इसमें आप सहयोगी बनें और मेरे न्यूज पोर्टल को सपोर्ट करें। "जय हिन्द, जय भारत"

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