बस्तर में यूजीसी विनियमन २०२६ का जबरदस्त विरोध: दंतेश्वरी मंदिर के सामने सवर्ण समाज ने धरना देकर कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
जगदलपुर। उच्च शिक्षा में भेदभाव रोकने के नाम पर लाए गए यूजीसी (यूजीसी) विनियमन २०२६ को लेकर छत्तीसगढ़ के बस्तर में सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। समाज के प्रमुखों ने इसे 'असंवैधानिक', 'भेदभावपूर्ण' और 'सामान्य वर्ग के खिलाफ एकतरफा काला कानून' करार देते हुए तत्काल वापसी की मांग की।
धरने का नेतृत्व सवर्ण समाज के समन्वयक आशुतोष द्विवेदी ने किया। विरोध की शुरुआत दंतेश्वरी मंदिर के सामने सुबह १० बजे एक विशाल धरने के साथ हुई। पंडाल के नीचे बैठे सैकड़ों प्रदर्शनकारियों और नेताओं ने तख्तियां लेकर नारेबाजी की।
सभी समाज के नेताओं ने रखी आपत्ति:
इस मौके पर क्षत्रिय, ब्राह्मण, कायस्थ, राजपूत, जैन, सिंधी, बंगाली समेत तमाम सवर्ण समाजों के प्रमुखों ने अपनी-अपनी आपत्ति दर्ज कराई। सभी ने एक स्वर में कहा कि किसी भी सूरत में इस नियम को लागू नहीं होने देंगे। मंच से कैलाश चौहान, संजीव शर्मा, अर्जुन श्रीवास्तव, योगेश ठाकुर, भंवर बोथरा, मनीष मूलचंदानी सहित कई नेताओं ने विस्तार से अपने पक्ष रखे।
कलेक्टर को सौंपा गया ज्ञापन:
दोपहर साढ़े बारह (१२:३०) बजे प्रदर्शनकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल बस्तर कलेक्टर आकाश छिकारा के कार्यालय पहुंचा। उन्होंने राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के नाम लिखा ज्ञापन सौंपते हुए यूजीसी विनियमन २०२६ को वापस लेने की औपचारिक मांग की।
ज्ञापन में उठाए गए प्रमुख मुद्दे:
१. असंवैधानिकता: आरोप है कि यूजीसी एक्ट के तहत केवल अकादमिक मानकों के नियम बनाए जा सकते हैं, जातीय भेदभाव पर नहीं। इसलिए यह विनियमन स्वतः असंवैधानिक है।
२. सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव का प्रावधान नहीं: नियम में भेदभाव की परिभाषा में केवल एससी/एसटी/ओबीसी/महिला/दिव्यांग को ही शामिल किया गया है। सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव होने पर शिकायत का कोई रास्ता नहीं दिया गया, जो अनुच्छेद १४ (समता का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है।
३. पक्षपातपूर्ण जांच की आशंका: शिकायतों की जांच करने वाली 'इक्विटी कमेटी' में सामान्य वर्ग के सदस्य को शामिल करने का प्रावधान नहीं है, जिससे एकतरफा फैसले की आशंका जताई गई।
४. झूठी शिकायत पर कार्रवाई का अभाव: नियमों में यदि शिकायत झूठी पाई जाती है तो शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान नहीं है, जिससे दुरुपयोग को बल मिल सकता है।
५. संस्थानों पर दबाव: नियम तोड़ने पर शिक्षण संस्थानों की ग्रांट रोकने और मान्यता रद्द करने के प्रावधान के चलते, संस्थान मेरिट के आधार पर निर्णय लेने से डर सकते हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यूजीसी विनियमन २०२६ एक "एकतरफा काला कानून" है, जिसे सामान्य वर्ग के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने की पूरी आशंका है। उन्होंने इसके तत्काल रद्द किए जाने की मांग को दोहराया।
