जगदलपुर में स्थानीय कलाकारों ने बिखेरी लोक कला की छटा, छत्तीसगढ़ राज्योत्सव का समापन
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस की रजत जयंती के तीन दिवसीय समारोह का जगदलपुर के सिटी ग्राउंड में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ समापन हो गया। इस यादगार शाम में स्थानीय लोक कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक और आधुनिक कला का अद्भुत संगम पेश कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का आगाज आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल की मोक्षी पांडे द्वारा प्रस्तुत ओजस्वी देवी तांडव के साथ हुआ, जिसने पूरे मंच को एक दिव्य ऊर्जा से भर दिया। इसके बाद, कलाकार शिवानी सामदेकर ने अपने मनमोहक 'छत्तीसगढ़ नृत्य' के जरिए राज्य के पारंपरिक जीवन, रीति-रिवाजों और त्योहारों की एक सजीव झांकी प्रस्तुत की।
बस्तर की जनजातीय संस्कृति ने बांधा समां
समारोह में बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति की झलक देखने को मिली। दरभा विकासखंड के छिंदावाड़ा के कलाकारों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ मनमोहक धुरवा नृत्य प्रस्तुत किया, जिसकी थाप पर दर्शक भी थिरक उठे। वहीं, नानगुर के नर्तकों ने अपनी विशिष्ट परब नृत्य शैली से समां बांधा। रास परब कला समूह द्वारा प्रस्तुत सामूहिक नृत्य ने भी खूब वाहवाही बटोरी।
स्कूली बच्चों ने बढ़ाया उत्साह
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में विवेकानंद स्कूल और कन्या क्रमांक 2 के छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत समूह नृत्यों ने भी दर्शकों का दिल जीत लिया। इन युवा प्रतिभाओं के जोश ने समारोह के उत्साह को और बढ़ा दिया।
"विकसित छत्तीसगढ़ बनाने में निभाएं भूमिका"
समापन समारोह में मुख्य अतिथि एवं नगर निगम सभापति खेमसिंह देवांगन ने कहा कि "राज्योत्सव हमें और तेजी के साथ विकास के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आइए, हम सभी एकजुट होकर विकसित छत्तीसगढ़ बनाने में अपनी सहभागिता निभाएं।"
पुरस्कार वितरण के साथ हुआ समापन
इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया और उनका हौसला अफजाई की गई।
इस अंतिम दिन के कार्यक्रम में कलेक्टर श्री हरिस एस, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा, सीईओ जिला पंचायत प्रतीक जैन, अपर कलेक्टर सीपी बघेल सहित अन्य जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ अधिकारी और बड़ी संख्या में शहर के नागरिक उपस्थित रहे।
तीन दिन तक चला यह रजत जयंती महोत्सव न केवल छत्तीसगढ़ के 25 साल के सफर की गरिमा के अनुरूप था, बल्कि इसने स्थानीय कलाकारों को एक बड़ा मंच देकर बस्तर की लोक कला एवं संस्कृति के संरक्षण और प्रोत्साहन में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
