ओडिशा को बचाने के लिए बस्तर के किसानों ने त्यागा अपना हित! छत्तीसगढ़ ने खोले भालूगुड़ा एनीकट के 38 जलद्वार
बाढ़ की आशंका पर छत्तीसगढ़ ने निभाया पड़ोसी धर्म, कृषकों ने जनहित में अपना हित त्यागकर दी सहमति; 'परहित सरिस धरम नहि भाई' की भावना हुई साकार
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| जगदलपुर: ओडिशा में संभावित बाढ़ की आशंका को देखते हुए छत्तीसगढ़-ओडिशा सीमा पर स्थित भालूगुड़ा एनीकट का जलद्वार खोलते हुए जल संसाधन विभाग की टीम। — फोटो: पीआरओ |
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, छत्तीसगढ़ शासन की नीति के अनुसार वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद 15 सितंबर तक प्रदेश की एनीकट योजनाओं के जलद्वार स्थानीय निस्तारी, सिंचाई और भूजल पुनर्भरण के लिए बंद कर दिए जाते हैं। बस्तर क्षेत्र में भी यही व्यवस्था लागू थी। भालूगुड़ा एनीकट के कुल 38 जलद्वारों में से 28 पहले से क्रियाशील थे, जबकि शेष 10 जलद्वार स्थानीय निस्तारी के लिए बंद रखे गए थे। लेकिन संभावित चक्रवाती आपदा और ओडिशा जल संसाधन विभाग के विशेष आग्रह को देखते हुए छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग की विद्युत एवं यांत्रिकी शाखा, बस्तर ने ओडिशा जल संसाधन विभाग और एनएमडीसी के समन्वय से शेष 10 जलद्वार भी खोल दिए।
किसानों ने क्यों किया विरोध, फिर कैसे माने?
अधीक्षण अभियंता जल संसाधन इंद्रावती परियोजना मंडल जगदलपुर वेदप्रकाश पांडे ने बताया कि इस कार्रवाई के दौरान स्थानीय कृषकों ने जल संचयन और निस्तारी की आवश्यकताओं को लेकर शुरुआत में विरोध जताया। लेकिन जल संसाधन विभाग और स्थानीय प्रशासन द्वारा संभावित आपदा की गंभीरता तथा पड़ोसी राज्य के नागरिकों की सुरक्षा का महत्व समझाए जाने पर किसानों ने व्यापक जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सभी जलद्वार खोलने की सहर्ष सहमति दे दी।
'परहित सरिस धरम नहि भाई' की हुई साकार
बस्तर के कृषकों का यह संवेदनशील और उदार निर्णय भारतीय संस्कृति के महान आदर्श 'परहित सरिस धरम नहि भाई' की भावना को चरितार्थ करता है। छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग की यह पहल न केवल संभावित आपदा के प्रति सजगता और अंतरराज्यीय सहयोग का उदाहरण है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि मानवीय संवेदनशीलता, जनसुरक्षा और पड़ोसी धर्म के निर्वहन में राज्यों की सीमाएँ बाधक नहीं बन सकतीं।
