गायता पारा में सड़क नहीं, कीचड़ ही पहचान, विकास सिर्फ कागजों में

🏚️ सड़क नहीं, कीचड़ ही पहचान… गायता पारा में ‘विकास’ सिर्फ कागज़ों में!

दंतेवाड़ा के दुगेली ग्राम के गायता पारा में आज भी बुनियादी सुविधाएं सपना, पुलिया जर्जर, मरीजों को चारपाई में ढोना पड़ता है

📍 दंतेवाड़ा 🗓️ 23 जुलाई 2026
ग्राम पंचायत भवन दुगेली - गायता पारा का प्रवेश द्वार, जहां विकास की दूरी आज भी बरकरार
📸 ग्राम पंचायत भवन दुगेली। इस पंचायत के अंतर्गत आने वाले गायता पारा में आज भी पक्की सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य सुविधा जैसी बुनियादी चीजें नदारद हैं। यहां के 8 परिवार कीचड़ भरे रास्तों और जर्जर पुलिया के बीच जीवन संघर्ष कर रहे हैं।

✍️ ब्रम्हा सोनानी | बचेली

दंतेवाड़ा, 23 जुलाई 2026 | दंतेवाड़ा जिले के दुगेली ग्राम के गायता पारा में आज भी बुनियादी सुविधाएं सपना बनी हुई हैं। यहां पहुंचते ही साफ दिखता है कि विकास के दावे और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा अंतर है। गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है—डामर का नामोनिशान तक नहीं। चारों तरफ कीचड़, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और घने जंगलों से घिरा पहाड़ी इलाका है।

कीचड़ भरे रास्ते, जंगलों से घिरा गांव

गायता पारा पहुंचते ही सबसे पहले नजर आता है—कीचड़। बरसात में यह रास्ता पूरी तरह दलदल में बदल जाता है, जहां पैदल चलना भी जोखिम भरा हो जाता है। इस दुर्गम इलाके में करीब 8 परिवार निवास करते हैं, जिनका मुख्य सहारा खेती-किसानी है। लेकिन विडंबना यह है कि अपनी ही उपज को बाजार तक ले जाना इनके लिए किसी संघर्ष से कम नहीं।

⚠️ चेतावनी : बरसात में इस जर्जर पुलिया से गुजरना जानलेवा हो सकता है। फिर भी ग्रामीणों के पास कोई और रास्ता नहीं।

जर्जर पुलिया: दिखावा या सुविधा?

गांव के पास नाले पर एनएमडीसी सीएसआर मद से कई साल पहले एक पुलिया बनाई गई है, लेकिन यह पुलिया ग्रामीणों के किसी काम की नहीं दिखती। यह इतनी संकरी और कमजोर है कि चार पहिया वाहन, ट्रैक्टर या एंबुलेंस यहां से गुजर ही नहीं सकते। इतना ही नहीं, अब यह पुलिया जर्जर अवस्था में पहुंचती जा रही है, जिससे कभी भी बड़े हादसे का खतरा बना हुआ है।

“पुलिया बनी जरूर है, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए… सुविधा के लिए नहीं।”

बीमार पड़ने पर चारपाई में ढोना पड़ता है मरीज

सबसे दर्दनाक स्थिति तब होती है जब गांव में कोई बीमार पड़ता है। ऐसे में मरीज को चारपाई में उठाकर कीचड़ भरे रास्ते और इस संकरी व जर्जर पुलिया तक लाना पड़ता है, जहां से आगे सड़क तक पहुंचकर ही एंबुलेंस मिल पाती है।

सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी भी यहां संघर्ष बन चुकी है—

  • 🛒 बाजार जाना हो,
  • 🍚 राशन लाना हो,
  • 🏛️ या पंचायत तक पहुंचना हो,

हर काम के लिए ग्रामीणों को जंगल और कीचड़ से जूझना पड़ता है।

सबसे बड़ा सवाल: जब देश डिजिटल इंडिया और विकास के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, तब दंतेवाड़ा के इस छोटे से पारा में लोग आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं।

क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी इस गांव तक पहुंचेंगे?
या फिर गायता पारा यूं ही फाइलों में ‘विकसित’ होता रहेगा?

basant dahiya

मेरा नाम बसंत दहिया है। मैं लगभग 20 वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा हूं। इसी बीच मैंने बस्तर जिला व राजधानी रायपुर के प्रमुख समाचार पत्रों में अपनी सेवा देकर लोकहित एवं देशहित में कार्य किया है। वर्तमान की आवश्यकता के दृष्टिगत मैंने अपना स्वयं का न्यूज पोर्टल- समग्रविश्व अप्रेल 2024 से शुरू किया है जो जनहित एवं समाज कल्याण में सक्रिय है। इसमें आप सहयोगी बनें और मेरे न्यूज पोर्टल को सपोर्ट करें। "जय हिन्द, जय भारत"

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