बस्तर में लीची क्रांति: 9 साल बाद सफल फलन, किसानों के लिए नई आय

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बस्तर में लीची क्रांति; नौ साल की वैज्ञानिक मेहनत से पहली बार सफल फलन, किसानों के लिए खुला नया आय का रास्ता

📅 12 मई, 2026 📍 जगदलपुर, बस्तर ✍️ विशेष संवाददाता
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जगदलपुर। बस्तर की पहचान अब धीरे-धीरे बदल रही है। पारंपरिक खेती वाले इस क्षेत्र में अब बागवानी के नए प्रयोग सफल होने लगे हैं। पहली बार यहाँ लीची के पौधों में सफल फलन हुआ है।

महात्मा गाँधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित डेब्रिधुर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, जगदलपुर के वैज्ञानिकों की ९ वर्षों की सतत मेहनत ने इतिहास रच दिया है। पहली बार बस्तर में लीची के पौधों में फल लगे हैं, जिसे कृषि क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

इस सफलता की शुरुआत वर्ष 2016-17 में हुई, जब तत्कालीन वैज्ञानिक डॉ. गणेश प्रसाद नाग ने कृषि महाविद्यालय, अंबिकापुर से लीची की उन्नत किस्मों को लाकर जगदलपुर स्थित महाविद्यालय प्रक्षेत्र में रोपण कराया। उस समय बस्तर की जलवायु में लीची की खेती को लेकर कोई ठोस उदाहरण मौजूद नहीं था।

🌱 प्रमुख लीची किस्में (प्रयोग में)

🍒 इंद्रा लीची-2 🥭 अंबिका लीची-1 🇨🇳 चाइना 👑 शाही 🌹 रोज सेंटेड

करीब 40 पौधों में अब सफल फलन, वैज्ञानिकों ने 9 साल तक अनुकूलन क्षमता और उत्पादन पर अध्ययन किया।

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डॉ. राम कुमार देवांगन

पौध प्रावर्धन, पुष्पन, फल सेट सुधार, ट्रेनिंग-प्रूनिंग और फ्रूट क्रैकिंग जैसी समस्याओं पर गहन शोध।

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डॉ. भागवत कुमार भगत

लीची के मूल्य संवर्धन (जूस, जैली, स्क्वैश) पर काम, उत्पादों को बाजार से जोड़ने की पहल।

“यह शोध बस्तर के कृषि क्षेत्र को नई दिशा देगा।”

— प्रो. रवि रतन सक्सेना, कुलपति, महात्मा गाँधी उद्यानिकी विश्वविद्यालय

बस्तर में लीची क्रांति: डॉ. गणेश प्रसाद नाग, डॉ. राम कुमार देवांगन और वैज्ञानिक लीची के पेड़ के नीचे सफल फलन का प्रदर्शन करते हुए, जगदलपुर अनुसंधान केंद्र
बस्तर में ऐतिहासिक सफलता: डॉ. गणेश प्रसाद नाग (मध्य में), डॉ. राम कुमार देवांगन (बांए) एवं अन्य वैज्ञानिक(दांए) लीची के पेड़ के नीचे सफल फलन का प्रदर्शन करते हुए। नौ साल के शोध के बाद जगदलपुर के डेब्रिधुर उद्यानिकी महाविद्यालय प्रक्षेत्र में पहली बार लीची के पौधों में फल लगे हैं। 

उद्यानिकी महाविद्यालय जगदलपुर के अधिष्ठाता डॉ. गणेश प्रसाद नाग ने बताया कि, जिन उन्नत किस्मों को विकसित किया गया है, उनके पौधे अब किसानों को उपलब्ध कराए जाएंगे। किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जाएगा, ताकि वे इस नई फसल को आसानी से अपना सकें।

9 साल की रिसर्च

2016-17 में शुरू हुआ प्रयोग। सिंचाई, पोषण प्रबंधन, रोग नियंत्रण पर ध्यान। 9 साल बाद ऐतिहासिक सफलता।

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किसानों के लिए गेम चेंजर

नगदी फसल, बाजार में अच्छी कीमत। आय के नए रास्ते। कॉलेज में मॉडल प्रक्षेत्र से प्रशिक्षण मिलेगा।

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प्रोसेसिंग तक रोडमैप

जूस, जैली, स्क्वैश जैसे उत्पाद। ग्राफ्टिंग व फ्रूट क्रैकिंग रोकने की तकनीक।

🌟 बस्तर में लीची की यह सफलता

केवल एक कृषि उपलब्धि नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों की दूरदृष्टि, धैर्य और नवाचार का परिणाम है। आने वाले समय में यह पहल क्षेत्र की पहचान बदलेगी और किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूती देगी।

📢 किसान साथियों के लिए उन्नत पौधे और प्रशिक्षण जल्द ही महाविद्यालय प्रक्षेत्र, जगदलपुर में उपलब्ध होंगे।
© न्यूज़ पोर्टल | बस्तर कृषि डेस्क

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मेरा नाम बसंत दहिया है। मैं लगभग 20 वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा हूं। इसी बीच मैंने बस्तर जिला व राजधानी रायपुर के प्रमुख समाचार पत्रों में अपनी सेवा देकर लोकहित एवं देशहित में कार्य किया है। वर्तमान की आवश्यकता के दृष्टिगत मैंने अपना स्वयं का न्यूज पोर्टल- समग्रविश्व अप्रेल 2024 से शुरू किया है जो जनहित एवं समाज कल्याण में सक्रिय है। इसमें आप सहयोगी बनें और मेरे न्यूज पोर्टल को सपोर्ट करें। "जय हिन्द, जय भारत"

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