‘अक्ति’: सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि कृषि सभ्यता की प्राचीन विरासत और नई शुरुआत का प्रतीक

कुम्हरावंड में मनाया गया अंकुरण का पर्व, वैज्ञानिकों ने किसानों को जैविक खेती और जल संरक्षण की दी सीख

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‘अक्ति’ के अवसर पर प्रतीकात्मक बीज बुवाई: किसान के साथ केवीके के वैज्ञानिक
जगदलपुर। सोमवार को कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) कुम्हरावंड में जिस ‘अक्ति त्योहार’ का आयोजन हुआ, वह भारतीय कृषि परंपरा के उस दुर्लभ पहलू को उजागर करता है, जहाँ मिट्टी और बीज के बीच संबंध को ‘उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। प्रातः 11 बजे से शुरू हुआ यह कार्यक्रम सिर्फ एक स्थानीय पर्व भर नहीं था, बल्कि सहस्रों वर्ष पुरानी कृषि चेतना का जीवंत दस्तावेज था।

‘अक्ति’ का अर्थ: सिर्फ एक शब्द नहीं, पूरी संस्कृति

‘अक्ति’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘अंकुरण’ (Germination) होता है। यह वह दिन है, जब किसान सौंदर्य और विश्वास के साथ नए कृषि चक्र का शुभारंभ करते हैं। गौरतलब है कि ‘अक्ति’ या ‘अकिति’ शब्द सिर्फ छत्तीसगढ़ या बस्तर तक सीमित नहीं है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह नाम मेसोपोटामिया की प्राचीन ‘अकीतु’ (Akitu) परंपरा से भी जुड़ता है, जो जौ की बुवाई का उत्सव था और नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक माना जाता था 

भारतीय संदर्भ में देखें तो अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) को कई क्षेत्रों में ‘अक्ती’ या ‘आखा तीज’ के नाम से जाना जाता है, जहाँ वसंत ऋतु में अंकुरित अन्न (स्प्राउट्स) वितरित करने की परंपरा है । बस्तर का ‘अक्ति’ उसी वैश्विक कृषि परंपरा की एक अनोखी स्थानीय अभिव्यक्ति है, जहाँ बीज को बोने से पहले उसकी पूजा की जाती है।

केवीके के खेत में प्रतीकात्मक बुवाई और किसानों की भागीदारी

इस वर्ष का आयोजन केवीके के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संतोष कुमार नाग के मार्गदर्शन में किया गया। पारंपरिक विधि से विधिवत पूजा कर प्रतीकात्मक रूप से बीज बुवाई की गई, जिसे छापरभानपुरी गांव के एक किसान ने संपन्न करवाया। आसपास के गांवों से आए लगभग 30 से 40 किसानों ने इस अनुष्ठान को देखा और अपने कृषि अनुभव साझा किए। दोपहर 3 बजे तक चले इस कार्यक्रम का समापन सामूहिक स्वल्पाहार के साथ हुआ।

क्यों जरूरी है अक्ति? वैज्ञानिकों ने समझाया महत्व

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केवीके कुम्हरावंड का संपूर्ण स्टाफ: वैज्ञानिकों से लेकर तकनीकी कर्मचारी तक

जहाँ एक ओर यह त्योहार परंपरा से जुड़ा है, वहीं कृषि वैज्ञानिकों ने इसे आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए किसानों को व्यावहारिक सलाह दी:

  • बीज संरक्षण (डॉ. तेजपाल चंद्राकर): वैज्ञानिक ने ‘नमक घोल’ से बीज उपचार की तकनीक बताई। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचते हुए जैविक खेती को अपनाना ही दीर्घकालिक समाधान है।

  • जल संरक्षण (डॉ. राहुल साहू): ‘अक्ति’ के अवसर पर किसानों को ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई के महत्व से अवगत कराया गया। यह तकनीक न केवल मिट्टी की नमी बनाए रखती है, बल्कि फसलों की जड़ों को गहराई तक जाने में मदद करती है।

  • गुणवत्ता परीक्षण ( दुष्यंत पांडेय): किसानों को बीज अंकुरण परीक्षण की उपयोगिता समझाते हुए उन्नत बीजों के प्रयोग पर जोर दिया गया, ताकि ‘अक्ति’ का संकल्प सफल हो सके।

  • प्राकृतिक खेती (डॉ. कोमल गुप्ता): डॉ. गुप्ता ने प्राकृतिक खेती के साथ-साथ इससे बनने वाले उत्पादों की बाजार में उपयोगिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

मानसून और संस्कारों का अटूट रिश्ता

विशेषज्ञों के अनुसार, अक्ति जैसे त्योहार भारतीय कृषक समाज की मानसून से जुड़ी चिंताओं को दर्शाते हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो दक्षिण भारत में ‘आटी कालेंजा’ (Aati Kalanja) जैसे त्योहार इसी महीने आते हैं, जहाँ भारी बारिश के चलते किसान घरों में रहकर पारंपरिक लोकनृत्य और भोजन बनाते हैं, जिसे ‘आटीदोंजी दिना’ कहा जाता है । इसी तरह जापान में ‘अकिता कांतो’ (Akita Kanto) उत्सव बांस की लंबी छड़ियों पर लालटेन लटकाकर भरपूर फसल की कामना करता है । यह वैश्विक समानता साबित करती है कि ‘बुवाई का उत्सव’ मानव सभ्यता का सार्वभौमिक संस्कार रहा है।

उपस्थित वैज्ञानिक और कार्यक्रम का समापन

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र जगदलपुर के वैज्ञानिक धर्मपाल केरकेट्टा, डॉ. सुन्ना दीप्ति, डॉ. वेंकेटेश्वर जल्लारफ, डॉ. नीलम बंजारे, इंजी. कमल ध्रुव, दिनेश ध्रुव, सनत उइके सहित क्षेत्र के प्रगतिशील किसान उपस्थित थे। सभी ने संकल्प लिया कि इस ‘अक्ति’ से न केवल खेतों में, बल्कि अपनी सोच में भी अंकुरण होगा।

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