भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर : संविधान निर्माता का जीवन, संघर्ष और राष्ट्र के प्रति अशेष ऋण
लेखक : राधा माधव दास
(सेवानिवृत्त प्राचार्य, एम.ए. अर्थशास्त्र एवं इतिहास, बी.एड., फॉर्मर पीएच.डी. शोधार्थी, सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश)
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भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर (1891-1956) |
परिचय : अमिट नाम
भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम इंसान के अस्तित्व का ऐसा परिचय है, जो शरीर के मिटने के बाद भी नहीं मिटता। यह नाम समय की शिला में किसी अमिट लिपि की तरह सदैव अंकित रहेगा। हम उनके चिर-कृतज्ञ हैं।
भारतीय संस्कृति का संदेश है कि मनुष्य कुछ पाने के लिए अपने को खो दे। दूसरों के हित में जो जीता है और दूसरों के हित में जो मरता है – उसका हर आंसू रामायण है और प्रत्येक कर्म गीता है। मनुष्य इतिहास का निर्माण तभी करता है जब वह नया इतिहास गढ़ता है, न कि सिर्फ इतिहास को दोहराता है।
डॉ. अम्बेडकर उस सरणी में रखे जा सकते हैं जिसमें कबीर, ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे विभूति शामिल हैं।
स्वाभिमान का उदय : असंभव को संभव करने वाला युग
20वीं शताब्दी की असंभव-संभावनाओं के युग में डॉ. अम्बेडकर (1891-1956) ने जन्म लिया। उस समय पूरे देश के चेहरे पर धर्मभेद, वर्णभेद, जातिभेद, अस्पृश्यता, असहिष्णुता और कट्टरपन की कालिख पुत चुकी थी। इस कालिख को मिटाने के लिए ही उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू (मध्यप्रदेश) में हुआ।
उनके व्यक्तित्व में पूर्व की संस्कृति एवं पश्चिम की ज्ञानधारा का अद्भुत समन्वय था। समानता के प्रति उनका आग्रह अनुपम था। उनका व्यक्तित्व इतना चुंबकीय था कि अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई।
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
उनकी जाति महार (अनुसूचित जाति) थी।
1905 में रामाबाई से विवाह (1935 में निधन)।
दूसरा विवाह 1948 में डॉ. शारदा कबीर से, जो मुंबई के सारस्वत ब्राह्मण परिवार से थीं।
बंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज से स्नातक।
एम.ए., पीएच.डी. (कोलंबिया विश्वविद्यालय, अमेरिका)।
1923 में लंदन से लॉ की उपाधि।
संघर्ष की प्रमुख घटनाएँ (तिथिक्रम)
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1906 | मानवाधिकार की पैरवी हेतु 'दलित मिशन सोसायटी' (बंबई) स्थापित |
| 1924 | 'बहिष्कृत भारत हितकारिणी सभा' का गठन (छात्रावास, पुस्तकालय, अध्ययन केंद्र) |
| 1927 | महाड़ के चवदार तालाब और कुओं पर दलितों के सार्वजनिक उपयोग हेतु आंदोलन |
| 1927 | हिंदू मंदिरों में प्रवेश के लिए सत्याग्रह एवं मनुस्मृति दहन |
| 1930 | राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश |
| 1930-31 | दलितों के लिए पृथक निर्वाचन हेतु आंदोलन |
| 1932 | तृतीय गोलमेज सम्मेलन (लंदन); ब्रिटिश प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड द्वारा 'कम्यूनल अवार्ड' (30 अप्रैल) |
| 1936 | स्वतंत्र मजदूर संघ की स्थापना |
| 1942 | अनुसूचित जाति फेडरेशन की स्थापना |
| 1946 | संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष नियुक्त |
| 1956 | नेहरू से मतभेद के बाद कानून मंत्री पद से त्यागपत्र; भारतीय रिपब्लिक पार्टी का गठन; बौद्ध धर्म की शरण (बौद्ध क्रांति) |
दलित वर्ग ने डॉ. अम्बेडकर को 'मसीहा' के नाम से पुकारा। 6 दिसंबर 1956 को उनका महापरिनिर्वाण हुआ।
उनका नारा था – "We are Indian first and last" (हम पहले और अंत में भारतीय हैं)।
ऐतिहासिक दृष्टि : वर्ण, जाति और शूद्र
डॉ. अम्बेडकर ने शोधपूर्वक निरूपित किया कि वेदों से यह प्रमाणित नहीं होता कि आर्यों का रंग दासों से भिन्न था। उनका मत था कि शूद्र उसी भंडार के हैं, जिसकी मुख्य शाखा क्षत्रिय जाति के रूप में विकसित हुई। अतः शूद्र भी द्विजत्व के अधिकारी हैं।
उनकी मान्यता थी – शूद्र प्रारंभ में उपनयन और यज्ञ के अधिकारी थे, लेकिन तैत्तिरीय संहिता के समय यह अधिकार छीन लिया गया। महाभारत के शांति पर्व में भी कहा गया है – संन्यास को छोड़कर शूद्र शेष तीनों आश्रमों में विधिवत जीवन यापन कर सकता है।
हिंदुत्व में कंपन : बौद्ध धर्म की ओर आकर्षण
"ऐसा हिंदू धर्म मेरा नहीं है" – डॉ. अम्बेडकर ने आदि शंकराचार्य के पौराणिक हिंदुत्व एवं उपनिषदों से विमुख होकर बौद्ध धर्म अपनाया। गीता में दो शब्द आते हैं – राजविद्या, राजगुह्यम्। भावार्थ : सबसे बड़ा ज्ञान, सबसे बड़ा रहस्य। अज्ञान से प्रकाश की ओर – यानी वे 'बुद्ध' (प्रबुद्ध) हो गए।
दो प्रमुख नारे
"कुछ भी करो, लेकिन शिक्षा प्राप्त करो"
"धर्म राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है, वह मनुष्य और ईश्वर के बीच निजी मामला है।"
कर्तव्या-कर्तव्य : समान सम्मान और सामाजिक न्याय
समान सम्मान और अधिकार – यही डॉ. अम्बेडकर का मूलमंत्र था। कांशीराम और मायावती ने दलित आंदोलन को नई दिशा दी, लेकिन अम्बेडकर का दृष्टिकोण पृथक था। वे चाहते थे कि भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए दलितों का सम्मान बढ़े।
अंग्रेजों के काल में 2000 जातियाँ थीं – अब बढ़कर 4000 से अधिक हो चुकी हैं। वे चाहते थे – जाति न रहे, केवल इंसान रहे।
ऐतिहासिक प्रसंग : लुईस फिशर का साक्षात्कार (फरवरी 1933)
लुईस फिशर (गार्जियन, न्यूयॉर्क टाइम्स) ने गांधी, जिन्ना और अम्बेडकर से मुलाकात की। गांधी और जिन्ना रात 9-11 बजे सोए हुए मिले। दोपहर 2 बजे जब फिशर अम्बेडकर के पास पहुंचे तो पूछा – "आप इतनी रात तक क्यों जाग रहे हैं?"
अम्बेडकर ने उत्तर दिया :
"वे सोए हैं क्योंकि उनका समाज जाग रहा है। मैं जाग रहा हूँ क्योंकि मेरा समाज सोया हुआ है।"
डॉ. अम्बेडकर जानते थे – जब तक वर्णवादी और जातिवादी व्यवस्था बनी रहेगी, दलितों का उत्पीड़न नहीं रुकेगा। गांधी जी ने भी महसूस किया – राष्ट्रीय एकता के लिए अस्पृश्यता निवारण अनिवार्य है। 1955 में अधिनियम द्वारा छुआछूत को अपराध घोषित किया गया।
महात्मा गांधी ने दलितों को 'हरिजन' कहकर संबोधित किया। ऐतिहासिक दृष्टि से यह शब्द गांधी जी के विचारों का प्रतिनिधित्व करता है।
संविधान शिल्पी : तर्क बनाम अनुभूति
प्रस्तावना (Preamble) में भारत को "संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य" बनाने की अवधारणा डॉ. अम्बेडकर की ही थी। वे संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने।
उपलब्धि : 315 अनुच्छेद और 6 अनुसूचियाँ – मात्र 2 वर्ष 18 दिन में तैयार। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू। यह विश्व का सबसे लंबा एवं विस्तृत लिखित संविधान है।
संविधान के सात आधार स्तंभ
सार्वभौमिकता
समाजवादी धर्मनिरपेक्षता
लोकतंत्रात्मक गणराज्य
न्याय – सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक
स्वतंत्रता – विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, पूजा
समानता – अवसर, भेदभाव-रहित
बंधुत्व – व्यक्तिगत सम्मान, एकता, अखंडता
उनकी संकल्पना थी – व्यक्तिगत समानता के अभाव में लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती।
1976 के 42वें संशोधन अधिनियम के तहत दलितों पर किसी भी प्रकार के भेदभाव या जातिगत अपमान को अपराध घोषित किया गया। सिविल मैरिज एक्ट ने विवाह को जाति मर्यादा के बंधन से मुक्त किया।
अशेष ऋण : पूर्व और उत्तरवर्ती समाज सुधारक
डॉ. अम्बेडकर से पहले और बाद में छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य समाज सुधारकों ने दलितों के उद्धार में उल्लेखनीय कार्य किया :
महात्मा ज्योतिबा फुले, गुरु घासीदास, गुरु अंगन दास, ठक्कर बापा (सी.पी. एंड बरार)
असम की : जमुना बाई, मती बाई, राधा बाई, केकती बाई, माना बाई, रूखमिणी बाई, रोहती बाई परगनिया, बेला बाई, फूलकुवर, मीनामाता, दयावती पार्वती बाई आदि।
युवाओं के लिए डॉ. अम्बेडकर एक प्रेरणा-बिंब हैं।
जीवन संघर्षों का सफरनामा
डॉ. अम्बेडकर का जीवन संघर्षों का सफरनामा है। उन्होंने अस्पृश्यता को समाप्त किया, दलितों को सम्मानपूर्वक जीने का अवसर दिया, और एक ऐसा संविधान दिया जो आज भारत के लोकतंत्र की नींव है। उनके प्रति हमारा ऋण अशेष है।
"जाति न रहे, केवल इंसान रहे" – यही उनका सपना था।
लेखक परिचय
राधा माधव दास
सेवानिवृत्त प्राचार्य, एम.ए. (अर्थशास्त्र एवं इतिहास), बी.एड.,
फॉर्मर पीएच.डी. शोधार्थी – सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश
शैक्षिक एवं सामाजिक शोध में सक्रिय।
